गुरुवार, 7 जनवरी 2021

Social Science Chapter 1 – RBSE Social Science Solutions

 Chapter 1 स्वर्णिम भारत-प्रारंभ से 1206 ई० तक – RBSE Social Science Solutions




पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न [Textbook Questions Solved]


स्वर्णिम भारत-प्रारंभ से 1206 ई० तक अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

राजस्थान के प्रमुख महाजनपद कौन-कौन से हैं?

उत्तर:

राजस्थान के प्रमुख महाजनपद मत्स्य और शूरसेन हैं।


प्रश्न 2.

बिन्दुसार के समय आए यूनानी राजदूत का क्या नाम था?

उत्तर:

बिन्दुसार के समय आए यूनानी राजदूत का नाम डायमेकस था।


प्रश्न 3.

पुराणों में अशोक का क्या नाम मिलता है?

उत्तर:

पुराणों में अशोक का नाम अशोक वर्धन था।


प्रश्न 4.

अंतिम मौर्य सम्राट कौन था?

उत्तर:

अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ था।


प्रश्न 5.

‘समाहर्ता’ नामक अधिकारी का क्या कार्य था?

उत्तर:

समाहर्ता का कार्य राजस्व एकत्र करना, आय-व्यय का ब्योरा रखना तथा वार्षिक बजट तैयार करना था।


प्रश्न 6.

कौटिल्य की पुस्तक का नाम बताइए।

उत्तर:

कौटिल्य की पुस्तक का नाम अर्थशास्त्र है।


प्रश्न 7.

पतंजलि किस शासक के काल में हुए थे?

उत्तर:

पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में हुए थे।


प्रश्न 8.

सातवाहन वंश के सबसे प्रतापी राजा का नाम क्या था?

उत्तर:

सातवाहन वंश के सबसे प्रतापी शासक का नाम गौतमीपुत्र शातकर्णि था।


प्रश्न 9.

‘प्रयाग (इलाहाबाद) प्रशस्ति’ का लेखक कौन था? वह किस शासक का दरबारी कवि था?

उत्तर:

प्रयाग प्रशस्ति का लेखक हरिषेण था। वह समुद्रगुप्त का दरबारी कवि था।


प्रश्न 10.

स्कन्दगुप्त ने मौर्यों द्वारा निर्मित किस झील का जीर्णोद्धार करवाया?

उत्तर:

जूनागढ़ अभिलेख द्वारा ज्ञात होता है कि स्कंदगुप्त ने मौर्यों द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया था।


प्रश्न 11.

हर्षवर्धन की साहित्यिक रचनाओं के नाम बताइए।

उत्तर:

हर्षवर्धन ने संस्कृत में ‘नागानंद’, ‘रत्नावली’ तथा ‘प्रियदर्शिका’ नाम से तीन नाटकों की रचना की।


प्रश्न 12.

पालवंशी राजा किस धर्म के अनुयायी थे?

उत्तर:

पालवंशी राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।


स्वर्णिम भारत-प्रारंभ से 1206 ई० तक लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

महाजनपदों में उल्लिखित गणराज्यों के नाम बताइए।

उत्तर:

महाजनपदों में दो प्रकार के राज्य थे-राजतंत्र और गणतंत्र। कौशल, वत्स, अवंति और मगध उस समय सर्वाधिक शक्तिशाली राजतंत्र थे। छठी शताब्दी ई० पूर्व में अनेक गणतंत्रों का भी अस्तित्व था, जिनमें प्रमुख थे-कपिलवस्तु के शाक्य, सुंसुमार-गिरि के भाग, अल्लकप्प के बुली, केसपुत के कालाम, रामग्राम के कोलिय, कुशीनारा के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मोरिय, वैशाली के लिच्छवि और मिथिला के विदेह।


प्रश्न 2.

अशोक के ‘धम्म’ का सार लिखिए।

उत्तर:

अशोक ने मनुष्य की नैतिक उन्नति हेतु जिने आदर्शों का प्रतिपादन किया उन्हें धम्म कहा गया। अशोक के धम्म की परिभाषा दूसरे तथा सातवें स्तंभलेख में दी गयी है। उसके अनुसार पापकर्म से निवृत्ति, विश्व कल्याण, दया, दान, सत्य एवं कर्मशुद्धि ही धम्म है।


साधु स्वभाव होना, कल्याणकारी कार्य करना, पाप रहित होना, व्यवहार में मृदुता लाना, दया रखना, दान करना, शुचिता रखना, प्राणियों का वध न करना, माता-पिता व अन्य बड़ों की आज्ञा मानना, गुरु के प्रति आदर, मित्रों, परिचितों, संबंधियों, ब्राह्मणों-श्रमणों के प्रति दानशील होना व उचित व्यवहार करना अशोक द्वारा प्रतिपादित धम्म की आवश्यक शर्ते हैं। तीसरे अभिलेख के अनुसार धम्म में अल्प संग्रह और अल्प व्यय का भी विधान था।


प्रश्न 3.

समुद्रगुप्त के सांस्कृतिक योगदान को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

गुप्त सम्राट वैदिक धर्म को माननेवाले थे। समुद्रगुप्त तथा कुमारगुप्त प्रथम ने तो अश्वमेध यज्ञ भी किया था। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को भी प्रश्रय दिया। उनके दरबारी कवि हरिषेण ने उनकी सैनिक सफलताओं का विवरण प्रयाग (इलाहाबाद) प्रशस्ति अभिलेख में किया है। यह अभिलेख उसी स्तंभ पर उत्कीर्णित है, जिस पर अशोक का अभिलेख उत्कीर्णित है।


उसके सिक्कों पर अश्वमेध पराक्रम लिखा मिलता है। यह ललित कलाओं में भी निपुण था। एक सिक्के पर उसकी आकृति वीणा बजाती हुई है। वह विष्णु का भक्त था, परन्तु दूसरे धर्मों का भी समान रूप से आदर करता था।


प्रश्न 4.

राष्ट्रकूट वंश का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर:

इस राजवंश की स्थापना दंतिदुर्ग ने 736 ई० में की थी। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसे वंश में 14 शासक हुए। दंतिदुर्ग वातापी के चालुक्यों के अधीन सामंत था। उसने अंतिम चालुक्य शासक कीर्ति वर्मा द्वितीय को पराजित करके दक्षिण में चालुक्यों की सत्ता समाप्त कर दी। कृष्ण प्रथम ने एलोरा के सुप्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण कराया।


वंश के चौथे शासक ध्रुव ने गुर्जर प्रतिहार शासक वत्सराज को पराजित किया और पाँचवें शासक गोविन्द तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय और पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया। उसने राष्ट्रकूटों के साम्राज्य को मालवा प्रदेश से कांची तक विस्तृत कर दिया। छठा शासक अमोघवर्ष शांतिप्रिय था, जिसने लगभग 64 वर्षों तक राज्य किया। उसी ने मान्यखेड़ को राष्ट्रकूटों की राजधानी बनाया। अरब यात्री सुलेमान ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की।


प्रश्न 5.

चोल प्रशासन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

चोल का प्रशासन ग्राम पंचायत प्रणाली पर आधारित था। प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से सम्पूर्ण चोल राज्य छह प्रांतों में बँटा हुआ था, जिनको मण्डलम कहा जाता था। मण्डलम के उप विभाग कोट्टम, कोट्टम के उपविभाग ‘नाडु’, कुर्रम’ और ‘ग्राम’ होते थे। अभिलेखों में नाडु की सभा को नाट्टर और नगर की श्रेणियों को ‘नगरतार’ कहा गया है।


गाँव के प्रतिनिधि प्रतिवर्ष नियमतः निर्वाचित होते थे। प्रत्येक मण्डलम को स्वायत्तता प्राप्त थी लेकिन राजा को नियंत्रित करने के लिए कोई केंद्रीय विधानसभा नहीं थी। भूमि की उपज का लगभग छठा भाग सरकार को लगान के रूप में मिलता था।


प्रश्न 6.

पल्लव वंश के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर:

इस वंश के शासक अर्काट, मद्रास, त्रिचनापल्ली तथा तंजौर के आधुनिक जिलों पर राज्य करते थे। शिलालेखों में पहले पल्लव राजा का उल्लेख कांची के विष्णुगोप का मिलता है। पल्लवों में सिंहविष्णु छठी शताब्दी ई० के उत्तरार्ध में सिंहासन पर बैठा। उसके बाद लगभग दो शताब्दियों तक पल्लवों ने राज्य किया।


प्रमुख पल्लव राजाओं के नाम महेन्द्र वर्मा प्रथम, नरसिंह वर्मा प्रथम, महेन्द्र वर्मा द्वितीय, परमेश्वर वर्मा, नरसिंह वर्मा द्वितीय, परमेश्वर वर्मा द्वितीय, नन्दी वर्मा, नन्दी वर्मा द्वितीय तथा अपराजित। महेन्द्र के पुत्र तथा उतराधिकारी नरसिंह वर्मा ने 642 ई० में पुलकेशिन द्वितीय को परास्त कर दिया और उसकी राजधानी वातापी पर अधिकार कर लिया, परंतु चालुक्यों ने 655 ई० में इस हार का बदला ले लिया। चालुक्य राजा विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लव राजा परमेश्वर वर्मा को पराजित कर उसकी राजधानी कांची पर अधिकार कर लिया।


प्रश्न 7.

कनिष्क का योगदान बताइए।

उत्तर:

कनिष्क ने 78 ई० में नया संवत चलाया, जिसे शक संवत के नाम से जाना जाता है। कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर वहाँ कनिष्कपुरै नामक नगर बसाया। उसने काशगर, यारकन्द व खेतान पर भी विजय प्राप्त की। महास्थाने में पायी गई सोने की मुद्रा पर कनिष्क की एक खडी मूर्ति अंकित है। मथुरा जिले में कनिष्क की एक प्रतिमा मिली है। इस प्रतिमा में उसने घुटने तक योगा और भारी बूट पहने हुए हैं। कनिष्क के राजदरबार में पाश्र्व, वसुमित्र, अश्वघोष जैसे बौद्ध विचारक, नागार्जुन जैसे प्रख्यात गणितज्ञ और चरक जैसे चिकित्सक विद्यमान थे। बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अभ्युदय और प्रचार कनिष्क के समय में ही हुआ।


स्वर्णिम भारत-प्रारंभ से 1206 ई० तक निबंधात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

महाजनपदों का उल्लेख करते हुए राजस्थान के प्रमुख जनपदों का परिचय दीजिए।

उत्तर:

वैदिक सभ्यता के विकासक्रम में राजस्थान में भी जनपदों का उदय देखने को मिलता है। जो निम्न प्रकार थे

1. जांगलः वर्तमान बीकानेर और जोधपुर के जिले महाभारत काल में जांगलदेश कहलाते थे। इस जनपद की राजधानी अहिछत्रपुर थी, जिसे इस समय नागौर कहते हैं। बीकानेर के राजा इसी जांगल देश के स्वामी होने के कारण स्वयं को जांगलाधर बादशाह कहते थे।


2. मत्स्यः वर्तमान जयपुर के आस-पास का क्षेत्र मत्स्य महाजनपद के नाम से जाना जाता था। इसका विस्तार चम्बल के पास की पहाड़ियों से लेकर सरस्वती नदी के जांगल क्षेत्र तक था। आधुनिक अलवर और भरतपुर के कुछ भू-भाग भी इसके अंतर्गत आते थे। इसकी राजधानी विराटनगर थी जिसे वर्तमान में ‘बैराठ’ नाम से जाता है।


3. शूरसेनः आधुनिक ब्रज क्षेत्र में यह महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी मथुरा थी। इसकी राजधानी को मेथोरा कहते हैं। महाभारत के अनुसार यहाँ यादव वंश का शासन था। भरतपुर, धौलपुर तथा करौली जिलों के अधिकांश भाग शूरसेन जनपद के अंतर्गत आते थे। अलवर जिले का पूर्वी भाग भी शूरसेन के अंतर्गत आता था। वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण का संबंध इसी जनपद से था।


4. शिविः शिवि जनपद की राजधानी शिवपुर थी तथा राजा सुशिन ने उसे अन्य जातियों के साथ दस राजाओं के युद्ध में पराजित किया था। प्राचीन शिवपुर की पहचान वर्तमान पाकिस्तान के शोरकोट नामक स्थान से की जाती है। कालांतर में दक्षिणी पंजाब की यह शिवि जाति राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में निवास करने लगी। चितौड़गढ़ के पास स्थित नगरी इस जनपद की राजधानी थी।


प्रश्न 2.

मौर्यकालीन प्रशासन एवं समाज का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

मौर्य काल में भारत में पहली बार केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था की स्थापना हुई। सत्ता का केंद्रीकरण राजा में होते हुए भी वह निरंकुश नहीं होता था। राजा द्वारा मुख्यमंत्री व पुरोहित की नियुक्ति उनके चरित्र की भलीभाँति जाँच के बाद ही की जाती थी। मंत्रिमंडल के अतिरिक्त परिशा मंत्रिणः भी होता था, जो एक तरह से मंत्रिपरिषद था।


केंद्रीय प्रशासन-अर्थशास्त्र में 18 विभागों का उल्लेख है, जिन्हें तीर्थ कहा गया है। तीर्थ के अध्यक्ष को महामात्र । कहा गया है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ थे-मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज।


समाहर्ता-इसका कार्य राजस्व एकत्र करना था।


सन्निधाता ( कोषाध्यक्ष )-साम्राज्य के विभिन्न भागों में कोषगृह और अन्नागार बनवाना। अर्थशास्त्र में 26 विभागाध्यक्षों का उल्लेख है, जैसे-कोषाध्यक्ष, सीताध्यक्ष (मुद्रा जारी करना), मुद्राध्यक्ष, पौतवाध्यक्ष, बंधनागाराध्यक्ष, आयविक (वन विभाग का प्रमुख) इत्यादि। ‘युक्त’ ‘उपयुक्त’ महामात्य तथा अध्यक्षों के नियंत्रण में निम्न स्तर के कर्मचारी होते थे।


प्रांतीय शासन-अशोक के समय में मगध साम्प्रज्य के पाँच प्रांतों का उल्लेख मिलता है-उत्तरापथ (तक्षशिला), अवंतिराष्ट्र (उज्जयिनी), कलिंग (तोसली), दक्षिणापथ (सुवर्णगिरि), मध्य देश (पाटलिपुत्र)। प्रांतों का शासन राजवंशीय ‘कुमार’ या आर्यपुत्र नामक पदाधिकारियों द्वारा होता था। प्रांत विषयों में विभक्त थे, जो विषय पतियों के अधीन होते थे। जिले का प्रशासनिक अधिकारी स्थानिक’ होता था, जो समाहर्ता के अधीन था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई का मुखिया ‘गोप’ था, जो दस गाँवों का शासन सँभालता था। समाहर्ता के अधीन प्रदेष्ट्र नामक अधिकारी भी होती था जो स्थानिक, गोप व ग्राम अधिकारियों के कार्यों की जाँच करता था। नगर शासन-मेगस्थनीज के अनुसार नगर का शासन-प्रबंध 30 सदस्यों का एक मंडल करता था जो 6 समितियों में विभक्त था।


सैन्य व्यवस्था-सेना के संगठन हेतु पृथक सैन्य विभाग था, जो 6 समितियों में विभक्त था। प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे। ये समितियाँ सेना के पाँच विभागों की देखरेख करती थी। ये पाँच विभाग थे-पैदल. अश्व, हाथी, रथ तथा नौसेना। सैनिक प्रबंध की देखरेख करनेवाली अधिकारी अंतपाल कहलाता था।


न्याय व्यवस्था-सम्राट न्याय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था। निचले स्तर पर ग्राम न्यायालय थे, जहाँ ग्रामणी और ग्रामवृद्ध अपना निर्णय देते थे। इसके ऊपर संग्रहण, द्रोणमुख, स्थानीय और जनपद स्तर के न्यायालय होते थे। सबसे ऊपर पाटलिपुत्र का केंद्रीय न्यायालय था। ग्राम संघ और राजा के न्यायालय के अतिरिक्त अन्य सभी न्यायालय दो प्रकार के थे-

(i) धर्मस्थीय

(ii) कंटकशोधन।


मौर्यकालीन समाज-कौटिल्य ने वर्णाश्रम व्यवस्था को सामाजिक संगठन का आधार माना है। कौटिल्य ने चारों वर्षों के व्यवसाय भी निर्धारित किए हैं। चार वर्षों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अन्य जातियों; जैसे-निशाद, पारशव, रथाकार, क्षता, वेदेहक, सूत, चांडाल आदि का उल्लेख भी किया है। मेगस्थनीज की इंडिका में भारतीय समाज का वर्गीकरण सात जातियों में किया है-दार्शनिक, किसान, पशुपालक व शिकारी, कारीगर या शिल्पी, सैनिक, निरीक्षक, सभासद तथा अन्य शासक वर्ग। मौर्यकाल में स्त्रियों की स्थिति को अधिक उन्नत नहीं कहा जा सकता, फिर भी स्मृतिकाल की अपेक्षा वे अधिक अच्छी स्थिति में थीं तथा उन्हें पुनर्विवाह व नियोग की अनुमति थी।


प्रश्न 3.

गुप्तवंश के प्रमुख शासकों का वर्णन करते हुए इस काल की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर एक लेख लिखिए।

उत्तर:

गुप्त वंश को 275 ई० में श्रीगुप्त ने प्रारंभ किया था। श्रीगुप्त के बाद घटोत्कच गुप्त शासक हुआ।


चन्द्रगुप्त प्रथम (320-335 ई०)-चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई० में एक संवत चलाया, जो गुप्त संवत के नाम से प्रसिद्ध


समुद्रगुप्त ( 335-380 ई०)-चन्द्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। समुद्रगुप्त के पास एक शक्तिशाली नौसेना भी थी।


चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-412 ई०)-राक विजय के पश्चात उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।


कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (414-455 ई०)-चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त शासक बना। कुमारगुप्त को ही नालंदा विश्वविद्यालय का संस्थापक माना जाता है। उसका राज्य सौराष्ट्र से बंगाल तक फैला था।


स्कन्दगुप्त (455-467 ई०)-स्कन्दगुप्त ज्येष्ठ पुत्र न होते हुए भी राज्य का उत्तराधिकारी बना। स्कन्दगुप्त ने अंततः हूणों को पराजित कर दिया।


गुप्त वंश की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ-समुद्रगुप्त तथा कुमारगुप्त प्रथम ने तो अश्वमेध यज्ञ भी किया था। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को प्रश्रय दिया। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था। गुप्तकाल की राजकाज की भाषा संस्कृत थी। अभिज्ञानशाकुंतलम् नाटक तथा रघुवंशम् महाकाव्य के रचयिता कालिदास, मृच्छकटिकम् नाटक के लेखक शूद्रक, मुद्राराक्षस नाटक के लेखक विशाखदत्त तथा सुविख्यात कोशकार अमरसिंह गुप्तकाल में ही हुए। .


रामायण, महाभारत तथा मनुसंहिता अपने वर्तमान रूप में गुप्त काल में ही सामने आई। गुप्तकाल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त ने गणित तथा ज्योतिर्विज्ञान के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया। इसी काल में दशमलव प्रणाली का आविष्कार हुआ, जो बाद में अरबों के माध्यम से यूरोप तक पहुँची। उस काल की वास्तुकला, चित्रकला तथा धातुकला के प्रमाण झाँसी और कानपुर के अवशेषों, अजन्ता की कुछ गुफाओं, दिल्ली में स्थित लौहस्तम्भ, नालंदा में 80 फुट ऊँची बुद्ध की ताँबे की प्रतिमा से मिलते हैं।


प्रश्न 4.

दक्षिण के चोल एवं चालुक्य राज्यों का सविस्तार वर्णन करें।

उत्तर:

चोल वंश का संस्थापक विजयालय था। चोल राजा विजयालय के पुत्र और उत्तराधिकारी आदित्य ने पल्लव नरेश

अपराजित को हराया था। आदित्य के पुत्र परांतक प्रथम ने पल्लवों की शक्ति को पुरी तरह कुचल दिया था। चोल राजराज प्रथम संपूर्ण मद्रास, मैसूर, कूर्ग और सिंहलद्वीप को अपने अधीन करके पूरे दक्षिणी भारत का एकछत्र सम्राट बन गया था। उसके पुत्र और उत्तराधिकारी राजेन्द्र प्रथम के पास शक्तिशाली नौसेना थी जिसने पेगू, मर्तबान तथा अंडमान निकोबार द्वीपों को जीता। उसने बंगाल और बिहार के शासक महिपाले से युद्ध किया। उसकी सेनाएँ कलिंग पार करके उड़ीसा, दक्षिण कोसल, बंगाल और मगध होती हुई गंगा तक भी पहुँची। इस विजय के उपलक्ष्य में उसने गंगईकोंड की उपाधि धारण की। उसका पुत्र और उत्तराधिकारी राजधिराज चालुक्य राजा सोमेश्वर के साथ हुए कोय्यम के युद्ध में मारा गया। परन्तु वीर राजेन्द्र ने चालुक्यों को कुडल संगमम के युद्ध में परास्त कर पिछली हार का बदला ले लिया।


चोलों में शीघ्र ही उत्तराधिकार के लिए युद्ध छिड़ गया। इसके फलस्वरूप सिंहासन राजेन्द्र कुलोतुंग को मिला, जिसकी माँ चोल राजकुमारी और पिता चालुक्य राज्य का स्वामी था। इस प्रकार कुलोतुंग ने चालुक्य चोलों के एक नये वंश की स्थापना की। उसने 40 वर्षों तक शासन किया। चालुक्य वंश-चालुक्य नरेशों में चौथा पुलकेशिन द्वितीय सबसे अधिक प्रख्यात है।


उसने 608 ई० में शासन ग्रहण किया। उसका राज्य विस्तार उतर में नर्मदा से लेकर दक्षिण में कावेरी नदी तक था। 642 ई० में वह पल्लव नरेश नरसिंहवर्मा द्वारा पराजित हुआ। पुलकेशिन के पुत्र विक्रमादित्य द्वितीय ने 973 ई० में राष्ट्रकूट नरेश को परास्त कर दिया और कल्याणी को अपनी राजधानी बनाकर नये चालुक्य राज्य की स्थापना की। यह नया राज्य 973 ई० से 1200 ई० तक कायम रहा।


कल्याणी के इस चालुक्य राज्य का एक लम्बे अर्से तक तंजौर के चोलवंशी शासकों से संघर्ष चला। सत्याश्रम नामक चालुक्य राजा को चोल नरेश राजराज ने परास्त किया। चालुक्य सोमेश्वर प्रथम ने इस अपमान का बदला न केवल चोल नरेश राजाधिराज को कोय्यम के युद्ध में करारी हार देकर लिया, वरन इस युद्ध में उसने राजाधिराज का वध भी कर दिया। सातवें नरेश विक्रमादित्य षष्ठ ने, जो विक्रमांक के नाम से भी विख्यात था, कांची पर अधिकार कर लिया।



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