गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

Chapter 3 अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष All Question-answer Solutions – RBSE SOCIAL SCIENCE Solutions

 Chapter 3 अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष – RBSE SOCIAL SCIENCE Solutions


पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न [Textbook questions solved]


अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष अति लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई थी?

उत्तर:

23 सितम्बर, 1600 ई० को।


प्रश्न 2.

सुर्जीगाँव की संधि कब और किसके मध्य हुई?

उत्तर:

1803 ई० में अंग्रेजों और सिंधिया के बीच सुर्जीगाँव की संधि हुई थी।


प्रश्न 3.

टीपू सुल्तान कहाँ का शासक था?

उत्तर:

मैसूर का शासक था।


प्रश्न 4.

अमृतसर की संधि कब हुई?

उत्तर:

25 अप्रैल, 1809 ई० को रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच अमृतसर की संधि हुई।


प्रश्न 5.

संन्यासी अंग्रेजों से क्यों नाराज थे?

उत्तर:

अंग्रेजों द्वारा तीर्थ स्थानों पर आने पर प्रतिबंध लगाने से संन्यासी लोग नाराज थे।


प्रश्न 6.

वासुदेव फड़के किस प्रांत से थे?

उत्तर:

महाराष्ट्र प्रांत से थे।


प्रश्न 7.

बिहार में 1857 ई० की क्रांति का नेतृत्व किसने किया?

उत्तर:

जगदीशपुर के कुँअर सिंह ने।।


प्रश्न 8.

व्यक्तिगत सत्याग्रह के प्रथम सत्याग्रही कौन थे?

उत्तर:

विनोबा भावे पहले सत्याग्रही थे।


प्रश्न 9.

बेगू का किसान आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?

उत्तर:

बेगू का किसान आंदोलन 1921 ई० में प्रारंभ हुआ।


अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

प्रथम अंग्रेज मराठा संघर्ष का उल्लेख कीजिए।

उत्तर:

1775 ई० से 1782 ई० के मध्य अंग्रेजों और मराठों के मध्य संघर्ष चला। इस संघर्ष में ब्रिटिश सेना, संगठित मराठा सेना से परास्त हुई और 29 जनवरी, 1799 ई० में बडगाँव की अपमानजनक संधि करनी पड़ी, जिसमें अंग्रेजों द्वारा विजित प्रदेश मराठों को वापस लौटाने तथा रघुनाथ राव को पूना दरबार के हवाले करने तथा अंग्रेजों द्वारा 41,000 युद्ध हर्जाने के रूप में देना तय हुआ।


प्रश्न 2.

चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के क्या परिणाम निकले?

उत्तर:

1798 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर बन लार्ड वेलेजली भारत आए। वेलेजली एक साम्राज्यवादी गर्वनर जनरल था। उसने निश्चय किया कि टीपू को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाए अथवा उसे पूर्णतया अपने अधीन कर लिया जाए। इस उद्धेश्य की पूर्ति करने के लिए वेलेजली ने सहायक संधि करने का सहारा लिया। टीपू सुल्तान ने सहायक संधि को अस्वीकार कर दिया। अप्रैल 1799 ई० में टीपू के विरुद्ध अभियान प्रारंभ कर दिया। अप्रैल 1799 ई० में टीपू के विरुद्ध अभियान प्रारंभ कर दिया। 4 मई, 1799 को श्रीरंगपट्टनम का दुर्ग जीत लिया तथा मैसूर की स्वतंत्रता समाप्त

हो गई। टीपू संघर्ष करता हुआ मारा गया।


प्रश्न 3.

विनायक दामोदर सावरकर का स्वतंत्रता संघर्ष में क्या योगदान है?

उत्तर:

बंगाल विभाजन के समय विनायक दामोदर सावरकर ने अपने साथियों के साथ मित्र मेला’ नामक संगठन बनाकर विदेशी कपड़ों की होली जलाई। जिस कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया। सावरकर एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने एक जन्म की नहीं, दो जन्मों की आजीवन कारावास की सजा दी थी। उनकी पुस्तक (द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस) प्रकाशन से पूर्व ही ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर ली थी। यह पुस्तक गुप्त रूप से विभिन्न शीर्षकों के नाम से भारत पहुँची थी। उन्होंने 1906 ई० में ‘अभिनव भारत’ की स्थापना की। सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1857 के संघर्ष को गदर न कहकर भारत का प्रथम स्वतंत्रता का युद्ध बताया। सावरकर का लंबा समय अंडमान की सेलूलर जेल में बीता।।


प्रश्न 4.

चंपारण किसान आंदोलन पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

उत्तर बिहार के चंपारण जिले में यूरोपीयन नील के उत्पादक किसानों पर अत्याचार करते थे। इसका विरोध करने के लिए गाँधीजी ने बाबू राजेन्द्र प्रसाद की सहायता से किसानों की वास्तविक स्थिति की जाँच की। किसानों को अहिंसात्मक आंदोलन करने के लिए कहा लेकिन बाद में जून 1917 में एक जाँच समिति बनाई। जिसकी रिपोर्ट पर चंपारण कृषि अधिनियम पारित किया गया जिसके द्वारा नील किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराना बंद कर दिया गया।


प्रश्न 5.

इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कब और कैसे हुई?

उत्तर:

1885 ई० में एक अंग्रेज भारतीय सिविल सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एलेन आक्टेवियन सूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। इसकी स्थापना के पीछे ब्रिटिश सरकार की सोच थी कि एक ऐसा संगठन बनाया जाए, जिससे भारतीयों के मन में क्या है इसकी जानकारी ब्रिटिश सरकार को मिलती रहे तथा इसके सम्मेलनों में राजनैतिक नेताओं के मन की भड़ास निकल जाएगी तथा उन्हें अंग्रेजी शासन को हटाने के सशक्त प्रयास करने से भी रोका जा सकेगा। 28 दिसम्बर, 1885 ई० को व्योमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में बंबई के गोकुल दास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में प्रथम अधिवेशन प्रारंभ हुआ इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।


प्रश्न 6.

गोविन्द गुरु ने कौन-सा आंदोलन चलाया?

उत्तर:

गोविन्द गुरु ने भगत आंदोलन चलाया था। भीलों के सामाजिक व नैतिक उत्थान के लिए गोविन्द गुरु ने सम्प सभा स्थापित की व उन्हें हिन्दू धर्म के दायरे में बनाए रखने के लिए भगत पंथ की स्थापना की। सम्प सभा द्वारा मेवाड़, डुंगरपुर, गुजरात, ईडर, विजयनगर और मालवा के भीलों में सामाजिक जागृति से शासन सशंकित हो उठा, और भीलों को बेगार कृषि कार्य के लिए बाध्य किया और जंगलों में उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया तो उन्होंने आंदोलन प्रारंभ कर दिया। गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन बाद में छोड़ दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने भगत आंदोलन को निर्ममतापूर्वक कुचल दिया तथा गोविन्द गुरु को 10 वर्ष की कारावास की सजा दी गई।


प्रश्न 7.

बिजौलिया किसान आंदोलन को समझाइए।

उत्तर:

बिचौलिया किसान आंदोलन राजस्थान के अन्य किसान आंदोलनों का अगुआ रहा। 1897 ई० में गिरधरपुरा नामक गाँव में गंगा राम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज के अवसर पर हजारों किसानों ने अपने कष्टों की खुलकर चर्चा की और मेवाड़ महाराणा को उनसे अवगत करवाया। महाराणा ने सुनवाई के बाद किसानों की लगान और बेगार संबंधी शिकायतों की जाँच के लिए सहायक राजस्व अधिकारी हामिद हुसैन को नियुक्त किया। लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। इन क्षेत्रों में भंयकर आकाल पड़ा।


इसके बावजूद 1903 ई० में राव कृष्ण सिंह ने किसानों पर ‘चेवरी कर’ नामक एक नया कर लगा दिया। किसानों ने इसका मौन विरोध किया। उदयपुर राज्य सरकार ने 1919 ई० में बिजौलिया के किसानों की शिकायतों को सुनने के लिए एक आयोग का गठन किया। आयोग ने किसानों के पक्ष में अनेक सिफारिशें की, किन्तु मेवाड़ सरकार द्वारा इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिए जाने के कारण आंदोलन पूर्ववत जारी रहा। यह आंदोलन 1941 ई० तक चलता रहा।


प्रश्न 8.

साइमन कमीशन को भारतीयों ने क्यों विरोध किया?

उत्तर:

1919 के भारत सरकार अधिनियम के कार्यों की समीक्षा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1927 ई० में सर जॉन

साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया। इसमें सात सदस्य थे लेकिन इसमें कोई भी भारतीय नहीं था। इसलिए

भारतीयों ने साइमन कमीशन का विरोध किया।


प्रश्न 9.

प्रजामण्डलों की राजस्थान में स्थापना क्यों की गई?

उत्तर:

1938 ई० में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में देशी राज्यों के आंदोलन को समर्थन देने का प्रस्ताव पास होने के बाद विभिन्न देशी रियासतों में प्रजामंडलों की व्यवस्थित स्थापना हुई। देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना, सामंती अत्याचारों व शोषण का विरोध, देशी रियासतों में राजनैतिक जागृति पैदा करना और देश में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए जो राजनैतिक संगठन स्थापित हुए उन्हें प्रजामंडल कहा गया। राजस्थान की सभी रियासतों में अपने-अपने प्रजामंडल कार्यरत रहे थे। जिन्होंने आजादी तक उपर्युक्त मुद्दों पर समय-समय पर अनेक आंदोलनों का संचालन किया।


अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष निबंधात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)


प्रश्न 1.

मराठों व मैसूर द्वारा अंग्रेजों से किए गए संघर्ष का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

18वीं सदी में भारत में मराठा शक्ति एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी थी लेकिन 1761 के पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मराठों की शक्ति कमजोर हो गई थी। मराठों और अंग्रेजों के मध्य तीन युद्ध हुए


प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध-1775 ई० से 1782 ई० के मध्य अंग्रेजों और मराठों के मध्य संर्घर्ष चला। इस संघर्ष में ब्रिटिश सेना, संगठित मराठा सेना से परास्त हुई।

द्वितीय अंग्रेज मराठा संघर्ष-यह संघर्ष 1802 से 1805 तक चला। इस संघर्ष का कारण लार्ड वेलेजली की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा तथा मराठा सरदारों का आपसी द्वेष रहा। इस संघर्ष में मराठा सरदारों ने अलग-अलग अंग्रेजों से युद्ध किया और पराजित हुए।

तृतीय अंग्रेज मराठा संघर्ष- भारत में अंग्रेजों की सर्वश्रेष्ठता बनाए रखने के लिए 1817 को पेशवा के साथ और सिंधिया को अंग्रेजों के साथ अपमानजनक संधि करनी पड़ी। इन अपमानजनक बंधनों को तोड़ने के लिए मराठों ने संघर्ष आरंभ कर दिया लेकिन पेशवा की किर्की, भोंसले की सीतवर्डी तथा होल्कर की महींदपुर स्थान पर पराजय हुई। आंग्ल मैसूर संघर्षः

प्रथम आंग्ल मैसूर संघर्ष-1767 ई० में हैदरअली ने ब्रिटिश प्रभाव वाले क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया। अंत में अंग्रेज पराजित हुए। लाचार अंग्रेजों को हैदरअली के साथ 1769 ई० में मद्रास की संधि करनी पड़ी।

 द्वितीय आंग्ल मैसूर संघर्ष-द्वितीय आंग्ल मैसूर संघर्ष 1780 में प्रारंभ हो गया। हैदरअली को सफलता मिल रही थी, लेकिन 1782 को हैदर की मृत्यु हो गई। टीपू ने एक वर्ष तक युद्ध जारी रखा लेकिन दोनों पक्षों ने युद्ध से परेशान होकर 1784 ई० में मंगलौर की संधि कर ली।।

 तृतीय आंग्ल मैसूर संघर्ष-1790 ई० में तृतीय आंग्ल मैसूर संघर्ष शुरू हुआ। टीपू ने वीरतापूर्वक मुकाबला किया लेकिन अंत में 23 फरवरी, 1792 ई० को श्रीरंगपट्टनम की संधि करनी पड़ी। इस संधि से मैसूर का आधार भाग चला गया और क्षति के रूप में तीन करोड़ की राशि अंग्रेजों को देनी पड़ी।

चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध-वेलजली ने टीपू पर सहायक संधि के लिए दबाव डाला जिसे टीपू सुल्तान ने अस्वीकार कर दिया। अंग्रेजों ने 1799 ई० में टीपू के साथ युद्ध छेड़ दिया। टीपू संघर्ष करता हुआ मारा गया।

प्रश्न 2.

1857 ई० के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

1857 ई० के विद्रोह की शुरुआत 10 मई को हुई थी। सैनिकों द्वारा चर्बी वाले कारतूसों के प्रयोग से मना करने पर अनुशासनहीनता के अपराध में उनको दंड दिया गया। मई 1857 ई० में छावनी में 85 सैनिकों के चर्बी युक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना करने पर सैनिक न्यायालय ने दीर्घकालीन कारावास का दंड दिया। इसके बाद सैनिकों में असंतोष फैला और विद्रोह की शुरुआत हो गई। यह विद्रोह शीघ्र ही लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, झांसी, बनारस, जगदीशपुर और अन्य क्षेत्रों में फैल गया।


 दिल्ली-बहादुरशाह जफर को सैनिकों ने इस विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए कहा। मुगल सम्राट के नेतृत्व में यह विद्रोह दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में फैल गया। लेकिन जल्द ही इस विद्रोह को दबा दिया गया।

लखनऊ-लखनऊ में हजरत महल के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई थी। सर कॉलिन कैम्पवेल ने गोरखा रेजीमेंट की सहायता से नगर में प्रवेश किया। मार्च 1858 ई० को नगर पर अंग्रेजों का पुन: अधिकार हो गया।

कानपुर-5 जून, 1857 ई० को क्रांतिकारियों ने कानपुर पर अधिकार कर नाना साहिब को पेशवा घोषित किया। पेशवा नाना साहिब का साथ तात्या टोपे ने दिया। 6 दिसम्बर, 1857 को सर कैम्पबेल ने कानपुर पर पुनः अधिकार कर लिया।

झांसी-रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में झाँसी में विद्रोह की शुरुआत हुई थी। सर ह्यूरोज ने झांसी पर आक्रमण करके अप्रैल 1858 को पुन: उस पर अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ती हुई वीरगति को प्राप्त हो गई।

बिहार-बिहार में इस क्रांति का नेतृत्व जगदीशपुर के जमींदार 80 वर्षीय कुंवर सिंह ने किया। कुंवर सिंह ने अंग्रेज सेनापति गिलमेल, कर्नल डेक्स, मार्क और मेजर डालस को धूल चटाई।

 अन्य क्षेत्र-बरेली में बहादुर खान ने क्रांति में भाग लिया। बनारस में भी क्रांति हुई लेकिन कर्नल नील ने उसे दबा दिया। उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में सैनिक क्रांतिकारियों की संख्या कम थी फिर भी इस महान संघर्ष में दक्षिण भारत के भी अनेक क्रांतिकारी शहीद हुए, सजाएँ भुगती एवं बन्दी बनाए गए। 1857 ई० के स्वतंत्रता संग्राम के दक्षिणी भारत के प्रमुख नेतृत्व करनेवालों में रंग बापू जी गुप्ते (सतारा), सैयद अलाउद्दीन (हैदराबाद) आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 3.

1919 ई० में 1949 ई० तक चलाए गए जनआंदोलनों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

1919 ई० में रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई जिसमें 20 हजार आदमी इकट्ठे हुए। जनरल डायर ने इन पर गोलियाँ चलवा दी जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इसके बाद संपूर्ण भारत में रोलेट एक्ट के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया।


असहयोग एवं खिलाफत आंदोलन-खिलाफत आंदोलन भारतीय मुसलमानों द्वारा तुर्की के खलीफा के सम्मान में चलाया था। तुर्की का खलीफा मुस्लिम जगत का धार्मिक गुरु था। 19 अक्टूबर, 1919 को पूरे देश में खिलाफत | दिवस मनाया गया। गांधी जी भी इस आंदोलन में शामिल हुए और ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि को लौटा दिया।

असहयोग आंदोलन-रोलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड, हन्टर कमेटी की रिपोर्ट, तुर्की विभाजन, खलीफा का पद समाप्त करना आदि से गाँधीजी अधिक पीड़ित हुए। 1920 में गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। इसके अंतर्गत सरकारी उपाधियों को छोड़ने, विधान सभाओं, न्यायालयों, सरकारी उपाधियों को छोड़ने, विधान सभाओं, न्यायालयों, सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं, विदेशी माल इत्यादि का त्याग करना तथा कर न देना आदि शामिल था। 5 जनवरी, 1922 ई० को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस द्वारा अत्याचार करने पर भीड़ ने पुलिस चौकी को आग लगा दी जिसमें 21 सिपाही एक थानेदार की मौत हो गई। गाँधीजी ने आंदोलन को हिंसात्मक होते देख 12 फरवरी, 1922 को यह आंदोलन वापस ले लिया।

 साइमन कमीशन का विरोध-1919 के भारत सरकार अधिनियम के कार्यों की समीक्षा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1927 ई० में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया। इसमें सात सदस्य थे लेकिन इसमें कोई भी भारतीय नहीं था। 3 फरवरी, 1928 ई० को जब यह कमीशन बंबई पहुँचा तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ।

 सविनय अवज्ञा आंदोलन-30 दिसम्बर, 1929 ई० के काँग्रेस अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में काँग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया। गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत 1930 ई० में दांडी पहुँचकर अवैध नमक बनाकर कानून को तोड़ा। इस आंदोलन में गैर कानूनी नमक बनाने, महिलाओं द्वारा शराब की दुकानों, अफीम के ठेकों, विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देना, विदेशी वस्त्रों को जलाना, चरखा कातना, छुआछुत से दूर रहना, विद्यार्थियों द्वारा सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ना तथा सरकारी कर्मचारियों को नौकरियों से त्यागपत्र देने का आह्वान गाँधीजी ने किया। यह आंदोलन तेजी से पूरे भारत में फैल गया। 5 मार्च, 1931 को सरकार और काँग्रेस के मध्य गाँधी-इरविन समझौता हुआ। गाँधीजी ने भारतीय संवैधानिक सुधारों के लिए बुलाए गए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। वे वहाँ से निराश लौटे और पुनः 1932 ई० में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया। 1933 में गाँधीजी ने अपने आंदोलन की असफलता को स्वीकार कर लिया और काँग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन-17 अक्टूबर, 1940 को गाँधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की। विनोबा भावे पहले, जवाहरलाल नेहरू दूसरे और ब्रह्मदत तीसरे सत्याग्रही थे। इस व्यक्तिगत सत्याग्रह में 30,000 लोग पकड़े गए।

भारत छोड़ो आंदोलन- 8 अगस्त, 1942 ई० को बंबई काँग्रेस अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन को चलाये जाने का निर्णय लिया गया। 9 अगस्त को गाँधीजी सहित दूसरे काँग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए तथा काँग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। फिर भी संपूर्ण देश में यह आंदोलन जारी रहा।

प्रश्न 4.

भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारियों का क्या योगदान रहा? उल्लेख कीजिए।

उत्तर:

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन की शुभारंभ 19वीं सदी के अंत में हुआ। इस क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्र महाराष्ट्र, बंगाल, संयुक्त प्रांत और पंजाब प्रांत था।।

महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन-महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधि का प्रारंभ 1876 ई० में वासुदेव बलवंत फड़के नामक सरकारी कर्मचारी ने किया। फड़के ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जगह-जगह पर भाषण दिया और लोगों में उत्तेजना फैलायी। ब्रिटिश सरकार ने 1879 ई० में फड़के को गिरफ्तार कर अदन की जेल में भेज दिया जहाँ 1889 में उनका स्वर्गवास हो गया। पूणे के दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर”तथा वासुदेव हरि चापेकर बंधुओं ने दो अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर दी। चापेकर बंधुओ को गिरफ्तार कर लिया गया और फाँसी की सजा दी गई। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन शहर में 1905 ई० में भारत स्वशासन समिति का गठन किया। शीघ्र ही बी०डी० सावरकर, लाला हरदयाल और मदन लाल धींगरा जैसे क्रान्तिकारी इसके सदस्य बन गए।

विनायक दामोदर सावरकर-वीर सावरकर ने 1906 ई० में अभिनव भारत की स्थापना की। सावरकर का लंबा समय अंडमान की सेलूलर जेल में बीता। 1924 ई० में स्वास्थ्य खराब होने के बाद रत्नागिरी में नजरबन्द रखा गया, बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।


बंगाल में क्रान्तिकारी आंदोलन-बंगाल में क्रान्तिकारी आंदोलन का सूत्रपात पी० मिश्रा ने एक क्रांतिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति का गठन कर दिया। बंगाल में राजनैतिक जागृति बंगाल विभाजन के बाद आई। अब आंदोलन का उद्देश्य विभाजन को रद्द करवाना ही नहीं, बल्कि स्वराज्य की प्राप्ति बन गया। 1905 ई० में वारिन्द्र कुमार घोष ने ‘भवानी मंदिर’ नामक पुस्तक लिखकर क्रान्तिकारी कार्यों को संगठित करने की विस्तृत जानकारी दी थी। युगांतर और ‘संध्या’ नाम की पत्रिकाओं में भी अंग्रेज विरोधी विचार प्रकाशित किए जाने लगे। एक अन्य पुस्तक ‘मुक्ति कौन पाथे’ में सैनिकों से भारतीय क्रांतिकारियों को हथियार देने का आग्रह किया।


प्रश्न 5.

राजस्थान में किसान आंदोलनों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

राजस्थान में राजनीतिक चेतना का प्रारंभ यहाँ के किसानों व जनजातीय समाज ने किया। राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में किसानों का आंदोलन हुआ, जिसमें बिजौलिया किसान आंदोलन, सीकर किसान आंदोलन, बेंगू किसान आंदोलन, बरड़ किसान आंदोलन, नीमूचणा किसान आंदोलन प्रमुख थे।


बिजौलिया किसान आंदोलन-किसान आंदोलन राजस्थान के अन्य किसान आंदोलनों का अगुआ रहा। विभिन्न प्रकार के लगानों के कारण बिजौलिया की किसानों की स्थिति पहले से काफी दयनीय थी, इसके बावजूद भी स्थानीय शासक ने इनपर नया कर लगा दिया। इसके बाद किसानों में असंतोष फैला और शासन के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया। उदयपुर राज्य सरकार ने अप्रैल 1919 ई० में बिजौलिया के किसानों की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए मांडलगढ़ हाकिम बिन्दुलाल भट्टाचार्य की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। आयोग ने किसानों के पक्ष में अनेक सिफारिशें की किन्तु मेवाड़े सरकार द्वारा इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिए जाने के कारण आंदोलन पूर्ववत जारी रहा, जो 1941 ई० तक चलता रहा।


सीकर किसान आंदोलन-किसान आंदोलने का प्रारंभ सीकर ठिकाने के नए रावराजा कल्याण सिंह द्वारा 25 से 50 प्रतिशत तक भूराजस्व वृद्धि करने से हुआ। 1931 ई० में राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा की स्थापना के बाद किसान आंदोलन को नई ऊर्जा मिली। 1935 ई० के अंत तक किसानों की अधिकांश माँगें स्वीकार कर ली गई।


बेगू किसान आंदोलन-बिजौलिया किसान आंदोलन से प्रेरित होकर बेगू ठिकाने के कृषकों ने भी 1921 में आंदोलन प्रारंभ कर दिया। क्योंकि यहाँ के लोग भी लगान वे लोग-बाग के अत्याचारों से पीड़ित थे। इस आंदोलन का नेतृत्व विजय सिंह पथिक जैसे कुछ किसान कर रहे थे। राज्य के अत्याचारों से किसानों का मनोबल गिरता देख पथिक ने गुप्त रूप से बेगू पहुँचकर स्वयं किसान आंदोलन का नेतृत्व सँभाल लिया। मेवाड़ सरकार द्वारा इन्हें 10 सितम्बर, 1923 को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जिसके बाद आंदोलन धीरे-धीरे समाप्त हो गया।


बरड़ किसान आंदोलन-अनेक प्रकार के लगान, बेगार आदि से त्रस्त बूंदी राज्य के बरड़ क्षेत्र के किसानों ने बूंदी प्रशासन के विरुद्ध अप्रैल 1922 ई० में आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के कार्यकर्ता नयनूराम शर्मा के हाथों में था। 1927 ई० के बाद राजस्थान सेवा संघ अंतर्विरोधों के कारण बंद हो गया। अत: राजस्थान सेवा संघ के साथ ही बूंदी का बरड़ किसान आंदोलन समाप्त हो गया।


नीमूचणा किसान आंदोलन (अलवर)-अलवर में सूअरों को मारने पर प्रतिबंध था और ये सूअर किसानों की फसल को बर्बाद कर देते थे। इन सूअरों के उत्पात से दुखी होकर 1921 ई० में अलवर के किसानों ने आंदोलन प्रारंभ कर दिया। बाद में महाराजा ने सूअरों को मारने की इजाजत दे दी। महाराजा ने नई भूमि दर लागू की। इस भूमि दर में राजपूतों, ब्राह्मणों से कम कर ली जाती थी लेकिन बाद में इनका विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया जिससे राजपूतों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर कर भाग लिया। राजा ने गोलियों और आगजनी के माध्यम से 156 लोगों को मार दिया और 600 लोगों को घायल कर दिया जिसकी आलोचना अनेक नेताओं ने की थी।

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